रणभूमि उत्तराखंड


सचिन तिवारी

देवभूमि उत्तराखंड जहाँ स्वयं भगवान विष्णु और महेश बसते हैं, जहाँ हर तरफ हरियाली और प्रकृति की खूबसूरती दिखती है वह उत्तराखंड प्राकृतिक आपदाओं को तो झेलता ही है साथ ही साथ राजनीतिक आपदाओं को भी झेल रहा है, उत्तराखंड जहाँ कब किस रोड़ पर लैंडस्लाइड हो जाए पता नहीं होता, वही कब राजनीति में लैंडस्लाइड हो जाए और सरकार गिर जाए ,मुख्यमंत्री बदल जाए पता नहीं होता , हाल में ही मुख्यमंत्री तीरथ के स्तीफे के बाद बीस साल के उत्तराखंड को पुष्कर सिंह धामी के रूप में 11वां मुख्यमंत्री मिला।
9 नवम्बर 2000 को जब छत्तीसगढ़ और झारखंड के साथ उत्तर प्रदेश से पृथक होकर उत्तराखंड बना तब यहाँ की जनता ने जश्न मनाया और राज्य आंदोलनकारी जो शहीद हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी गई । उत्तराखंड वासियों के लिए वह दिन एक त्योहार से कम नही था लेकिन वक्त के साथ साथ उत्साह कम होता चला गया , और उत्तराखंड खुद को ठगा और लुटा महसूस करने लगा ।
असल मे उत्तराखंड के साथ उसका दुर्भाग्य उसी दिन से शुरू हो गया था जिस दिन इसे उत्तर प्रदेश से अलग करके पृथक प्रदेश बनाया गया था, 90 के दशक में जब पृथक राज्य की मांग विधिवत रूप से आगे बढ़ी तब से ही प्रतावित राज्य उत्तराखंड की राजधानी के रूप में गैरसैंण को देखा जाने लगा, 25 जुलाई 1992 के दिन उत्तराखंड क्रांति दल ने गैरसैंण को पहाड़ की राजधानी तक घोषित कर दिया था, वीर चंद्र गड़वाली के नाम पर इसे चंद्र नगर नाम रखते हुए राजधानी का शिलान्यास तक कर दिया गया , लेकिन 90 के दशक में गठित कौशिक समिति ने जब 1994 में अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमे तमाम मुद्दों के साथ साथ गैरसैंण को राजधानी बनाने का मुद्दा भी था , उस पर चर्चा ही नही हुई। हालांकि बाद में जब प्रदेश की पहली सरकार बनी तो उसने राजधानी चयन आयोग का गठन किया जिसे दीक्षित आयोग भी कहा गया, लेकिन उत्तराखंड का दुर्भाग्य तब भी इसके साथ रहा दीक्षित आयोग ने कई सालों बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी तब भी स्थाई राजधानी के सवाल पर सरकार ने कोई निर्णय नही लिया, और पहाड़ की राजधानी पहाड़ एक छलावा बन कर रह गई ।
देश की प्रमुख पार्टियों भाजपा और कांग्रेस से उत्तराखंड की सत्ता संभाली , लेकिन उत्तराखंड की समस्या ज्यों की त्यों बनी रहीं हालांकि की अगर विकास की बात की जाए तो उत्तराखंड राज्य में सड़के बेहतर हुई हैं और कई सारे डैम भी बने हैं जिससे लोगों की रोजगार भी मिला है , वहीं विकास के साथ साथ विनाश की पटकथा भी लिखी गई , विकास के नाम पर उत्तराखंड की प्रकृति को क्षत विक्षत किया गया पेड़ पहाड़ों को काटा गया डैम के रूप में जल बम्ब बनाए गए , गांवों में पलायन हुआ कई गाँव के गाँव खाली हो गए, जहाँ जमीनों में खेती होती थी वहाँ आज जमीनें बंजर पड़ी हैं, लेकिन इन सब के बावजूद कई राजनीतिक पार्टियों की फसलें उत्तराखंड में लहलहा रही हैं और कई राजनीतिक पार्टियां अपनी जमीन तलाशने में लगी हैं ।
जहाँ अभी तक उत्तराखंड का राजनीतिक रण भाजपा और कांग्रेस में था वहीं आम आदमी पार्टी के प्रवेश से इस राजनीतिक रण को और ज्यादा रोमांचकारी बना दिया है , दिल्ली की जनता को जिस तरह से अरविंद केजरीवाल लुभाने और उनका विश्वास जीतने में कामयाब हुए हैं, उनका मनोबल काफी ऊँचा उठा हुआ है और वो उत्तराखंड में भी अपनी पैठ जमाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं , हाल में ही उन्होंने जिस तरह से देहरादून में प्रेस करके 300 यूनिट बिजली फ्री की घोषणा की उससे दोनों प्रमुख पार्टियों के माथे पर शिकन आ गई है, क्योकि आप को हल्के में लेना दोनों पार्टियों के लिए मंहगा साबित हो सकता है । हालांकि आगामी चुनाव में आप की सरकार बनेगी इसकी संभावना न के बराबर है लेकिन आम आदमी तमाम नेताओं और पार्टियों के समीकरण बदल सकती है इससे इनकार नही किया जा सकता।
कांग्रेस में जिस तरह से अंदरूनी कलह बनी हुई है और नेता के चयन में उनमें तकरार दिख रही है वह उनके लिए घातक साबित हो सकती है , छोटे नेता और कार्यकर्ताओं में एक तरह भ्रम की स्तिथि बनी हुई है , जिसके परिणाम स्वरूप कई छुटभैये नेता और कार्यकर्ता आप मे शामिल हुए है चूँकि आप उत्तराखंड में एक नई पार्टी के रूप में आई है इसलिए उनको इस पार्टी में अपना भविष्य दिख रहा है जिन नेताओ को कई सालों से पार्टी ने महत्व नही दिया वह आप मे जमीन तलाश कर रहे हैं , उत्तराखंड की राजनीति में कांग्रेस का ढ़ीला रवैया उनके लिए आगामी चुनाव में बहुत भारी पड़ सकता है ।
भाजपा की बात करें तो प्रदेश में पिछले कुछ महीनों में जिस तरह से उठापटक चली 2 मुख्यमंत्री बदले गए प्रदेश संगठन में बदलाव हुआ वह सब भाजपा के अंदर चल रहे गतिरोध और असंतोष को जाहिर करता है , कोरोना महामारी में प्रदेश की सरकार की नाकामी और प्रदेश के प्रमुख उद्योग पर्यटन उधोग का धराशायी होना , प्रदेश के लोगो के लिए एक झटके की तरह है , इससे लोगों में सरकार के प्रति असन्तोष बढ़ा है। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व इससे अनभिज्ञ नही है इसी के परिणामस्वरूप राज्य में परिवर्तन किए गए हैं , धामी को एक युवा मुख्यमंत्री के तौर पर उतार कर प्रदेश की जनता को नई सोच देने की कोशिश की जा रही हैं , लेकिन धामी की राह आसान नही होने वाली उनके सामने कई चुनौतियां हैं , हालांकि धामी ने शपथ लेते ही जो स्पीड दिखाई है वह उन्हें बाकी मुख्यमंत्रियों से अलग करती है लेकिन आगामी चुनाव को देखते हुए उनके पास वक्त कम है और पार्टी के अंदर मौजूद सीनियर नेताओ और विधायकों की नाराजगी से बचते हुए उनके लिए इतने कम समय में खुद को साबित करने की बहुत बड़ी चुनौती है ।
अगर बात की जाए उत्तराखंड की जनता की तो उत्तराखंड की जनता का मूड क्या बनता है और किस तरफ इनका वोट जाएगा अभी कहना मुश्किल है, जहाँ कुछ लोगों का कहना है कि अबकी कांग्रेस की सरकार बननी चाहिए वहीं कुछ लोग कांग्रेस को नेतृत्व विहीन पार्टी बता रहें हैं । जहाँ कुछ लोग भाजपा की सरकार बनने का दावा कर रहें है वही कुछ लोग महंगाई, बेरोजगारी और पर्यटन उधोग का धराशायी होना आगामी चुनाव में भाजपा की हार का कारण बता रहे हैं।
आप की बात करें तो कर्नल कोठियाल को अपनी टीम में शामिल करके उत्तराखंड के इस सियासी खेल में आप ने अपना तुरुप का इक्का दिखा दिया है जो निश्चित रूप से आप के लिए उत्तराखंड में एक सियासी जमीन तैयार करेगा लेकिन जीत हासिल करना अभी उनके लिए दूर की कौड़ी है । हालांकि एक मजबूत जनाधार उनको मिलेगा इससे इनकार नहीं किया जा सकता ।

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