रेलवे की सुरंग भी खतरे की जद में हैं


रतनमणी डोभाल
सोमवार 20 / 21जुलाई की रात में मानसून की पहली मूसलाधार बारिश में हर की पैड़ी की दीवार गिरी सबने देखी। लेकिन इसके अलावा भी दीवारें गिरी हैं। हर की पैड़ी के नजदीक ही कांगड़ा मोड़ पर श्रृंगेरी मठ के सामने रेलवे सुरंग के उपर की पहाड़ी पर भूस्खलन भी हुआ है। जिसके बड़े-बड़े पत्थर सड़क पर पड़े हुए हैं। जिला प्रशासन का एक आपदा प्रबंधन विभाग भी है लेकिन वह करता क्या है किसी को कुछ पता नहीं है।

हर की पैड़ी की दीवार गिरने की तो जांच भी बैठी और उठ भी गई पर किसी का बाल बांका भी हुआ की जानकारी नहीं है। भूमिगत केबिल तथा गैस पाइपलाइन उसी ढर्रे से डाली जा रही है। माननीय ने कह दिया है कि हर की पैड़ी की दीवार पहले से भी भव्य बनाई जाएगी। दीवार गिरने की वजह पानी का रिसाव बताया गया। लेकिन पानी का रिसाव तो यूपीसीएल द्वारा अंधाधुंध ढंग से दीवार की नींव में भूमिगत विद्युत केबिल ठूंसने से ही हुआ है।इस पर पर्दा डाल दिया गया है।

दीवार तो शारदा मठ की भी गिरी और हर की पैड़ी से बड़ी गिरी । उसको बनवाना तो दूर आपदा प्रबंधन विभाग झांकने भी नहीं गया है। दीवार और सड़क की नींव के अंदर किस तरह भूमिगत विद्युत केबिल को ठुंसा गया है फोटो में साफ दिखाई दे रहा है। सीवर का मेन होल भी बैठ गया है।

सबसे अधिक खतरा रेलवे सुरंग को होने वाला है। सुरंग के उपर पहाड़ी को खोद खोदकर अवैध निर्माण कर रेतीले पहाड़ को जर्जर कर दिया गया है। थोड़ी सी बारिश होने पर भूस्खलन होता रहता है परंतु कभी कोई इस ओर ध्यान नहीं देता है। सुरंग के ऊपर हुए एक बहुमंजिला निर्माण के के खिलाफ एचआरडीए दो बार ध्वस्तीकरण करने का आदेश पारित कर चुका है। तोड़ने के लिए टेंडर भी कराया गया लेकिन अवैध निर्माण खड़ा है और एचआरडीए अधिकारियों का मुंह चिड़ा रहा है। इसकी आड़ में और भी कई निर्माण पहाड़ी पर हुए हैं। इस गंभीर खतरे को अनदेखा किया जाना भविष्य में बहुत ही हानिकारक हो सकता है इससे पहले कई बार भूस्खलन में जानी नुकसान भी कांगड़ा मोड़ पर हो चुका है इसके बावजूद इसकी अनदेखी की जा रही है। सड़क पर पड़े पत्थर खतरे की घंटी बजा रहे हैं।

यह याद दिलाना ठीक होगा कि 2010 की आपदा के समय तत्कालीन उप जिलाधिकारी हरवीर सिंह जो वर्तमान में एच आर डी ए के सचिव तथा अपर मेला अधिकारी कुंभ हैं ने हर की पौड़ी से भीमगोडा नई बस्ती हिल बाईपास के नीचे के क्षेत्र को डेंजर जोन घोषित किया था और 92 परिवारों को विस्थापित करने की आवश्यकता बताई थी लेकिन इसके बाद भी इस पहाड़ी पर मानवीय हस्तक्षेप रुका नहीं है।

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